Top
undefined

व्यक्तित्व विकास से राष्ट्र विकास

स्वामी विवेकानंद मनुष्य के पूर्णत्व की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति थे

व्यक्तित्व विकास से राष्ट्र विकास
X

प्रो रामदेव भारद्वाज

स्वामी विवेकानंद मनुष्य के पूर्णत्व की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति थे, वे समाज से पृथक रहकर कंदराओं में जप और तप करने वाले संत नहीं थे अपितु समाज की मुख्य धारा के साथ-साथ जन्म लेने वाली तथा उसमें प्रवाहित होने वाली विसंगतियों को समाप्त करने की क्षमता रखने वाले तथा व्यक्तियों को प्रेरित कर समाजिक दुव्र्यसनों को दूर करने के लिए कटिबद्धता की प्रेरणा देने वाले संत थे। स्वामी जी स्वार्थी नहीं थे स्वयं की साधना, साधना से उत्पन्न शक्ति और शक्ति के संचय का प्रयोग उन्होंने स्वयं की स्वार्थ सिद्धि अर्थात मुक्ति अथवा मोक्ष के लिए नहीं किया अपितु समाज को, समाजिक धरोहर के रूप में अर्पित किया। स्वामी जी के जीवन का प्रत्येक क्षण व्यक्ति निर्माण, चरित्र निर्माण, समाज निमार्ण और राष्ट्र निर्माण की सरलतम पद्धति को प्रतिपादित करनें में समर्पित रहा। उन्होंने सदैव व्यक्तियों को प्रेरित किया कि स्वयं की परिधि से निकलकर समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित रहना चाहिए। स्वामी जी संपूर्ण आत्मिक और सामाजिक उन्नयन के प्रणेता थे। स्वामी विवेकानन्द ने व्यक्ति निर्माण/राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्तित्व विकास, ज्ञान और षिक्षा के लोकव्यापीकरण को आधार भूत स्त्रोत माना हैं। उनकी धारणा थी कि व्यक्तित्व का विकास ज्ञान और षिक्षा के बिना संभव नहीं है। ज्ञान से षिक्षा और शिक्षा से ज्ञान प्राप्त होता हैं अर्थात ज्ञान और षिक्षा एक ही सिक्के के पहलू है। प्रस्तुत आलेख में व्यक्तित्व विकास तथा ज्ञान और षिक्षा के परस्पर अन्तर्सम्बन्धों एवं अनेक प्रेरक तत्वों की विवेचना की गई है। स्वामी विवेकानन्द ने व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की आध्यात्मिक एवं मनौवज्ञानिक संरचना प्रस्तुत की है। प्रस्तुत आलेख में व्यक्तित्व विकास से संबंधित विविध आयामो की व्याख्या की गयी है जिसमें मनुष्य का वास्तविक स्वरूप, चरित्र निर्माण, व्यक्ति निर्माण के सकारात्मक एवं नकारात्मक तत्व, व्यक्ति समाज अन्तर संबंध, व्यक्तित्व विकास का मनोविज्ञान, इश्वर विषयक भाव, सामन्जस्य और व्यक्तित्व, व्यक्तित्व का कार्य-कर्तव्य का अन्र्तसंबंध, सेवाभाव और व्यक्तित्व की व्यापकता, संपूर्ण और व्यक्तित्व निर्माण, ज्ञान, चिंतन, मनन और व्यक्तित्व की व्यापकता से सम्बंधित है। इसके साथ ही साथ मनुष्य निर्माण एवं राष्ट्र निर्माण विषयक अनेक मौलिक प्रश्नों और जिज्ञासाओं संबंधित विविध आयामों को जिनका स्वामी विवेकानन्द ने विष्लेषण तथा समाधान दिया है, उनकी संदर्भित व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इनमें अनेक आयाम उभरकर सामने आते हैं जिनके ज्ञान के बिना न तो ज्ञान प्राप्ति संभव है और न ही षिक्षा के वास्तविक स्वरूप को समझ पाना संभव है। अत: स्वामी जी ने इंगित किया कि मानव मात्र को इस बात का ज्ञान होना बहुत आवष्यक है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप क्या है?, जीवन क्या है, अच्छा जीवन क्या है, नियति क्या है?, सुख क्या हैं?, दु:ख क्या है?, सफलता असफलता और संघर्ष क्या है?, मेरा उद्देष्य क्या हैं?, व्यक्ति अनादि काल से इन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए प्रयासरत है। व्यक्तित्व, व्यक्ति की भावनाओं, आचार-व्यवहार तथा व्यक्तिगत प्रतिक्रिया व्यक्त करने का प्रतिमान है। व्यक्ति का व्यक्तित्व मूलत: उसके द्वारा जीवन में लिए गये निणर्यो के संतुष्टीकरण का समुच्चय होता है तथा व्यक्तित्व विकास में अंतर्भूत नैसर्गिक, आनुवांषिक तथा पर्यावरणीय कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सामाजीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत व्यक्तित्व अपने मूल्यों, आस्थाओं तथा प्रत्याषाओं को मूर्त स्वरूप प्रदान करता है। व्यक्तित्व एक गत्यात्मक एवं उसके विविध गुणों की संगठित अभिव्यक्ति हैं जो विभिन्न परिस्थतियों में संज्ञान, मनोभाव, प्रेरणा और आचारण, से प्रभावित होकर प्रस्फुटित होती है। व्यक्तित्व व्यक्ति केंं चिन्तन की प्रक्रिया को भी निर्दिष्ट करता है इसके अन्तर्गत व्यक्ति कीं अनुभूतियॉं, सामाजिक सामंजस्य, तथा व्यवहार आते है जो समय-समय पर स्वंय के प्रत्यक्ष ज्ञान, मूल्यों तथा आचार व्यवहार से प्रभावित रहता है। इस प्रकार वस्तुत: व्यक्तित्व विकास स्वंय के यथार्थवादीकरण की प्रक्रिया है। व्यक्तित्व विकास के अनेक विचार और आधार व्यकत किए गये है जिनमें स्वतंत्रता विरूद्ध दृढ़ता, वंषानुगत विरूद्ध पर्यावरण, अद्वितीयता विरूद्ध सर्वव्यापकताए सक्रीयता विरूद्ध प्रतिक्रिया, आषावादी विरूद्ध निराषावादी प्रमुख है। व्यक्तित्व विकास के अनेक सिद्धान्त भी स्थापित किए गए हैं जिनमें विषेषत: मनोवेैषलेषिक सिद्धान्त, व्यवहारवादी सिद्धान्त, सामाजिक-ज्ञानात्मक सिद्धान्त, मानवतावादी सिद्धान्त, जीवमनोवैज्ञानिक सिद्धान्त एवं विकासवादी सिद्धान्त प्रमुख है।

स्वामी विवेकानंद ने व्यक्ति, समाज और राष्ट्र विकास से जुड़े हुए जिन अनेक प्रश्नों को केन्द्रित मानकर जिन आयामों की व्यापक व्याख्या की है, उनका विष्लेषण प्रस्तुत आलेख में किया जा रहा है। अध्ययन और समझ की दृष्टि से व्यक्तित्व विकास से संबंधित विविध आयामो को वारह सह-शीर्षक में विभाजित कर विष्लेषित किया गया है।

(1) चरित्र निमार्ण के आयाम के अंतर्गत, चरित्र क्या है?, चरित्र निर्माण क्यों?, चरित्र कैसे बनाए, विष्वास क्या है, विष्वास की आवष्यकता, विष्वास का संबर्धन कैसे करे, मजबूती क्या है?, मजबूती का स्त्रोत क्या हैं?, मजबूती कैसे प्राप्त की जाए?, निस्वार्थता क्या है?, सेवा क्या है?, स्वीकृति क्या हैं?, साहस, समपर्ण, आनंद और प्रेम क्या है?, नैतिकता क्या है?, अनाषक्ति क्या है?, इनके साथ-साथ आज्ञाकारिता, धैर्य, अव्यवसाय, सुचिता, आत्मसंयम, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, अहंकार, आलोचना, ईष्र्या, गंभीरता की कमी, आलसीपन, पक्षपात, प्रसिद्धि की चाह, सहानुभूति इत्यादि उपरोक्त सभी मानक व्यक्ति से व्यक्तित्व निर्माण के सार्थक उपक्रम हैं, साधन हैं इनका ज्ञान अनिवार्य है।

(2) समाज के आयाम के अन्तर्गत - समाज का लक्ष्य, समाज और व्यक्ति, समाज और धर्म, नीतिषास्त्र के लक्ष्य, अच्छाई और बुराई, नीतिषास्त्र की कमजोरियां के अन्तर्सम्बन्धों की विवेचना है।

(3) व्यक्तित्व निर्माण विषयक आयाम के अन्तर्गत विवेकानन्द ने जिन बिन्दुओं को स्पर्ष किया वे है - मन का स्वरूप, मन और विचार, मन और चेतना का स्तर, मन और अहंकार, मन और धर्म, मानसिक एकाग्रता और चिन्तन, मानसिक चिन्तन का परीक्षण, चित् नियंत्रण क्या है?, चित् का नियंत्रण क्यों?, चित् को नियंत्रित कैसे करें?

(4) इश्वर संबंधी आयाम के अन्तर्गत स्वामी विवेकानन्द ने जिन विषयों की व्याख्या की उनमें प्रमुख है-इश्वर का विचार, इश्वर का प्रमाणए इश्वर की आराधना क्यों?, ईश्वर के मार्ग, इश्वर में विष्वास, आत्मन् का स्वरूप, धर्म क्या हैं?, धर्म क्या नहीं है?, धर्म क्यों?, कौन सा धर्म सही हैं?, धार्मिक सामंजस्य, धर्म और तर्क, धर्म की अनुभूति, धर्म के मार्ग में बाधाएं, बाह्य प्रथाओं का प्रभाव, मूर्ति पूजा की अवधारणा, धर्म का परीक्षण, सार्वभौम धर्म।

(5) कर्म और दायित्व संबंधी आयाम के अन्तर्गत जिन विषयों की विवेचना की गई है उनमें प्रमुख है- कार्य क्या है?, कार्य के स्त्रोत क्या है?, कार्य क्यों?, कार्य करने की भावना, कर्तव्य क्या हैं?, कर्तव्य क्या नहीं है?, हमारे कर्तव्य क्या हैं?, कर्तव्य हमें कहॉं ले जाते हैं?, कर्तव्य करने की भवना।

(6) सेवाभाव विषयक आयाम सेवा भावना के आयाम में व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया दर्षाता है इसके अन्तर्गत-सेवा क्या हैं?, सेवा क्यों?, सेवा करने की भावनाए सेवा और परित्याग की समीक्षा प्रस्तुत की गई है।

(7) समर्पण संबंधी आयाम विवेकानंद चिन्तन का सार है इसमें समर्पण क्या हैं?, समर्पण का प्रयोजन, समर्पण के लाभ, समर्पण से नुकसान, समर्पण प्राप्त करने के मार्ग, समर्पण के सोपान, समर्पण की भावना की व्याख्या है।

(8) ज्ञान, चिन्तन और मनन संबंधी आयाम के अन्तर्गत विवेकानन्द ने विषयोंं की विवेचना की हैं जैसे-ज्ञान क्या हैं?, किसका ज्ञान?, चिन्तन-मनन-क्या हैं?, चिन्तन मनन क्यों?, योग क्या हैं?, योग के प्रकार, योग क्यों?, योग के आधार, योग का अनुभव, योग और रहस्य, योग के लिए समय।

(9) उन्मुक्तता संबंधी आयाम के अन्तर्गत व्यक्तित्व को सार्थक बनाने के दिषा में विविध विषयों का विष्लेषण किया गया है इनमें प्रमुख है-उन्मुक्तता क्या है?, किससे उन्मुक्तता, उन्मुक्तता क्यों?, उन्मुक्तता के बाद क्या होता है?, उन्मुक्तता कैसे प्राप्त करें? उन्मुक्तता और धर्म।

(10) एकत्व संबंधी आयाम के अन्तर्गत स्वामी विवेकानन्द व्यक्तित्व विकास को स्पष्ट किया हैं कि-एकत्व क्या है?, एकत्व कहां है?, एकत्व और समाज, एकत्व किसलिए?

(11) सत्य की प्रकृति संबंधी आयाम के अन्तर्गत मानव जीवन की सार्थकता के स्वरूप की व्याख्या करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट किया कि-सत्य की प्रकृति, व्यवहारिक जीवन में सत्य व्यकित्तव का सारभूत तत्व है।

Next Story
Share it