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'स्वदेश' भोपाल : ध्येयपथ पर 40 वर्षीय प्रवास

विजयादशमी व स्थापना दिवस के अवसर पर

अपनी सत्यनिष्ठा और संघर्षशील प्रतिमानों पर चलते हुये 'स्वदेश' ने भोपाल में अपने ध्येयपथ पर प्रवास के आज विजयादशमी पर 40वें वर्ष में प्रवेश कर लिया है। 1981 में विजयादशमी पर जिसे बीज रूप में रोपा गया, आज वह समय के तमाम झंझावतों को झेलते हुए, उनसे मुकाबला करते हुए और भारतमाता की वंदना करते, उसी से प्रेरणा और शक्ति प्राप्त करते हुये, एक पूर्ण वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो रहा है। विचार की प्रधानता और राष्ट्रभाव को सर्वोपरि रखते हुए 'स्वदेश' ने सदा ही सामाजिक जीवन में एकात्मता एवं राष्ट्रीय चेतना को जागृत करने का प्रयास किया है, उसमें हम कितना सफल हुऐ आकलन आप करेंगे परन्तु एक समाचार पत्र को इस भीषण व्यावसायिकता के दौर में इस रूप में संचालित करना और 40 वर्षों तक निरंतर अपनी साख और विश्वसनीयता बनाए रखते हुए 'समाचार भी, विचार' भी के अपने ध्येय वाक्य को प्रतिस्थापित करना संतोष की बात अवश्य है।

हम हमेशा जानते है कि है 'विचार' शाश्वत होते हैं और 'व्यक्ति' परिवर्तनशील। विचारों , का प्रतिस्थापन और प्राण प्रतिष्ठा, 'व्यक्ति' के सामथ्र्य पर भी निर्भर करता है। जगतगुरु आदि शंकराचार्य, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद सरस्वती, श्री गुरुजी, पं. दीनदयाल उपाध्याय इन सब ने अपने विचारों के साथ-साथ, उनकी स्वयं की मौलक विचार क्षमता, योग्यता और साधना से समाज को, प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। इसी तरह हर वैचारिक अनुष्ठान में सदा ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता होती है जो उस विचार को मजबूती से समाज के समक्ष रख सकें। उन विचारों को एक ऐसे माध्यम की भी आवश्यकता होती है जो उनके साथ मजबूती से खड़ा रहे।

'स्वदेश' भोपाल भी इस वैचारिक अनुष्ठान में अपनी अकिंचन आहुति देकर गर्व का अनुभव कर रहा है और आगे की प्रेरणा भी इसी संमार्ग पर चलने से प्राप्त हो, ऐसी प्रभु से कामना करते हैं।

परिस्थितियां भले ही प्रतिकूल रही हों या अनुकूल, 'स्वदेश' अपने स्वयं स्वीकृत मार्ग से कभी भी विचलित नहीं हुआ। न सत्ता ने हमें उन्मत्त बनाया और न विपरीत परिस्थितियों ने भयभीत किया। मेरा यह सौभाग्य रहा है कि मुझे प्रदेश की पत्रकारिता कीशीर्ष पंक्ति में विद्यमान मेरे पूज्य पिताजी श्री राजेन्द्र शर्मा जी का मार्गदर्शन व आशीर्वाद प्राप्त हुआ, जिन्हें देखकर , सुनकर, पढ़कर जो सीखा वह सिर्फ पत्रकारिता और प्रबंधन ही नही, जीवन की भी अमूल्य निधि है। जिन मूल्यों, आदर्शों व उद्देश्यों को लेकर पं. दीनदयाल जी उपाध्याय व भारतरत्न श्री अटल जी ने कभी लखनऊ से स्वदेश प्रारंभ किया था, उन्हें सही अर्थों में जीते हुए देखा है। वैसे तो 'स्वदेश' की नींव में कई मूर्धन्य विद्वत्जन रहे हैं, परंतु मैंने करीब से जिन्हें देखा व सीखा वे परिवार में पितामह की भूमिका में मामाजी श्री माणिकचंद्र जी वाजपेयी व मेरे पिताजी ही हैं।

जिस पवित्र विचारधारा को लेकर 'स्वदेश' का जन्म हुआ, उसे निरंतर निर्बाध गति से आगे बढ़ाते रहने का संकल्प लेकर, पुन: ध्येय के प्रति स्वयं को समर्पित करते हुए अपने सभी पाठकों, आलोचकों, समर्थकों, विरोधियों और स्वदेश परिवार के सभी संस्करणों के अपने सहयोगियों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं, वे सभी हमारी मूल शक्ति व पहचान हैं, उनके प्रति भी अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह हमें सदैव संमार्ग पर चलने की शक्ति, प्रेरणा व सामथ्र्य प्रदान करें, विजयादशमी का पावन पर्व अपनी दिव्य प्रेरणा के अनुरुप निरंतर विजयशीलता की ओर अग्रसर करे।

-अक्षत शर्मा

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