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निजी हितों के चलते ओआईसी संगठन में फूट डालने की कोशिश कर रहा है पाकिस्‍तान, जानिए क्या है ओआईसी

कश्‍मीर पर चर्चा से ओआईसी ने साफ इनकार कर दिया है। इसकी वजह से पाकिस्‍तान फिर इस संगठन में अलग-थलग पड़ गया है।

निजी हितों के चलते ओआईसी संगठन में फूट डालने की कोशिश कर रहा है पाकिस्‍तान, जानिए क्या है ओआईसी
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नई दिल्‍ली. पाकिस्‍तान का कश्‍मीर के मुद्दे पर पूरी दुनिया में अलग-थलग पड़ना कोई पहली बार नहीं हुआ है। लेकिन इस बार खास ये हुआ है कि इस्‍लामिक देशों के संगठन ओआईसी ने भी इस मुद्दे पर उसे अकेला छोड़ दिया है। बहुत कोशिश करने के बाद भी ओआईसी जैसे मंच पर कश्‍मीर के मुद्दे पर बहस न होने के फैसले से इमरान खान बुरी तरह से बौखला गए हैं। यह 57 इस्‍लामिक देशों का संगठन है। संयुक्‍त राष्‍ट्र के बाद इसी संगठन में सबसे अधिक देश सदस्‍य हैं। इस संगठन की तरफ से आया कोई भी बयान पूरी दुनिया के लिए खासा अहमियत रखता है। इस्‍लामिक सहयोग संगठन के सदस्‍य देशों की जनसंख्‍या की यदि बात करें तो 2018 के मुताबिक यह करीब 190 करोड़ है। इस्‍लामिक सहयोग संगठन के सदस्‍य देशों की जीडीपी की यदि बात की जाए तो यह करीब 27,949 अरब डॉलर की है। इसमें कतर और संयुक्‍त अरब अमिरात संगठन के सबसे अमीर देशों के तौर पर शामिल हैं। ये संगठन 43 लाख से अधिक लोगों नौकरी देता है।

जानिए इस संगठन की पूरी कहानी

इस संगठन के बनने की कहानी अपने आप में बेहद दिलचस्‍प है। 21 अगस्‍त 1969 को येरुशल की 800 वर्ष पुरानी अल-अक्‍स मस्जिद भीषण आग की चपेट में आने के बाद तबाह हो गई थी। उस वक्‍त येरुशलम के मुफ्ती अमीन-अल-हुसैनी ने इसका आरोप इजरायल पर डाला था। उन्‍होंने सभी मुस्लिम देशों से एक सम्‍मेलन में शामिल होने की अपील की। यह सम्‍मेलन इजरायल और अल-अक्‍स मस्जिद के पुनर्जिवित करने के मकसद से बुलाया गया था। 25 सितंबर 1969 को हुए इस सम्‍मेलन में 24 मुस्लिम देशों ने भाग लिया था। यह सम्‍मेलन मोरक्‍को के रबात शहर में आयोजित किया गया था।

1972 में नाम में किया गया परिवर्तन

इस सम्‍मेलन में सभी मुस्लिम देशों के बीच सहयोग बढ़ाने को लेकर एक प्रस्‍ताव पास किया गया। इसमें आर्थिक, विज्ञान, सांस्‍कृति और धार्मिक समेत सभी क्षेत्रों में सहयोग की बात की गई थी। इस सम्‍मेलन के छह माह बाद 1970 में मुस्लिम देशों के विदेश मंत्रियों की सऊदी अरब में बैठक आयोजित की गई जिसको ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्‍लामिक कॉफ्रेंस का नाम दिया गया था। 1972 में इसके नाम में बदलाव कर इसको ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्‍लामिक कॉपरेशन किया गया।

शांति और सहयोग बढ़ाना के लिए किया गया था संगठन का गठन

1969-1972 का समय इस संगठन के गठन के लिए बेहद खास रहा। इसके गठन के पीछे मकसद था इस्‍लामिक देशों के हितों को वर्यीयता देना और आपसी सहयोग बढ़ाना था। इसके अलावा इस संगठन का मकसद पूरी दुनिया के अन्‍य देशों के साथ मिलकर विश्‍व में शांति और सहयोग बढ़ाना भी था। आईआईसी एक ऐसा संगठन है जिसका संयुक्‍त राष्‍ट्र और यूरोपीय संघ में एक स्‍थायी प्रतिनिधिमंडल और राजदूत भी है। इसकी आधिकारिक भाषा अरबी, इंग्लिश और फ्रेंच है।

निजी हितों के चलते, पाकिस्‍तान ने संगठन में डाली फूट

ओआईसी जिस मकसद से शुरू हुआ था उसको बीते कुछ वर्षों में पाकिस्‍तान की वजह से पटरी से उतरता भी देखा गया है। पाकिस्‍तान लगातार इस संगठन में अपने वर्चस्‍व को बढ़ाने और अपने निजी हितों के लिए संगठन के दूसरे सदस्‍यों को भड़काने का काम करता रहा है। पाकिस्‍तान की लगभग सभी हुकूमतों ने ऐसा किया है, लेकिन वर्तमान में इमरान खान सरकार में इसकी काफी कोशिश की गई है। बात चाहे भारत में लागू हुए नागरिकता संशोधन कानून की हो या फिर कश्‍मीर में किए गए बदलावों की, पाकिस्‍तान की कोशिश रही है कि इस संगठन के माध्‍यम से इन मुद्दों को धार दी जाए। हालांकि इसमें उसको अब तक कामयाबी नहीं मिल सकी है।

ओआईसी अपने मकसद से गया है भटक - मलेशिया

पाकिस्‍तान और इस संगठन को लेकर एक खास बात ये भी है कि भले ही पाकिस्‍तान की निजी हितों के मुद्दे पर यहां नहीं चल सकी, लेकिन वह इसमें फूट डालने की नीति में कहीं न कहीं सफल होता जरूर दिखाई दिया है। ऐसा कहने की वजह मलेशिया द्वारा बीते वर्ष दिसंबर में किया गया हुआ मुस्लिम देशों का सम्‍मेलन है। आगे बढ़ने से पहले आपको ये बता दें कि मलेशिया और तुर्की उन देशों में शामिल हैं, जिन्‍होंने कश्‍मीर मुद्दे पर पाकिस्‍तान का साथ दिया है। मलेशिया ने इस सम्‍मेलन का आयोजन ओआईसी से अलग एक संगठन बनाने की कवायद के तहत किया था। मलेशिया के पीएम का कहना है कि ओआईसी अपने मकसद से भटक गया है और अब ये औचित्‍यहीन हो चुका है। इस सम्‍मेलन में सऊदी अरब के दबाव के चलते पाकिस्‍तान शामिल नहीं हुआ था। लेकिन कुछ देश जरूर इसमें शामिल हुए थे। यह सम्‍‍‍मेलन ओआईसी में फूट को दर्शाने के लिए काफी है।

इस संगठन में शरिया कानून को दी गई प्राथमिकता

इस संगठन के प्रतीक चिन्‍ह को बनाते समय इस बात का ध्‍यान रखा गया कि इसमें संगठन का मकसद और विजन दोनों ही प्रतिबिंबित हों। इसके अलावा इस्‍लाम को दर्शाने के लिए काबा भी दर्शाया गया है। 5 अगस्‍त 1990 को 45 सदस्‍य देशों के साथ ओआईसी ने मानवाधिकार पर आए कायरो प्रस्‍ताव को स्‍वीकार किया और सभी सदस्‍य देशों को इसके अनुसार चलने की अपील की। इसमें शरिया कानून को प्राथमिकता दी गई थी। 2008 में संगठन ने अपने चार्टर मे कुछ बदलाव किया था।

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