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लॉकडाउन के कारण आई भारी मात्रा में प्रदूषण में गिरावट, साफ सुथरी हो रही है धरती

गहराई से किया एक विश्लेषण बताता है कि जहां नोवेल कोरोना वायरस इंसान के फेफड़ों से हवा खींचने की कोशिश करता है, वहीं लॉकडाउन ने सही मायने में धरती माता को खुली साफ हवा देकर उन्हें नए प्राण बख्शे हैं.

लॉकडाउन के कारण आई भारी मात्रा में प्रदूषण में गिरावट, साफ सुथरी हो रही है धरती
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नई दिल्ली। कोरोना संकट से निपटने के लिए लागू लॉकडाउन ने लोगों की आवाजाही को बहुत सीमित कर रखा है. रेल, सड़क, समुद्र और आकाश, हर तरह का ट्रैफिक थमा हुआ है. कारखाने, बाजार, स्कूल-कॉलेज सब बंद हैं. संक्षेप में कहें तो पूरी दुनिया थमी हुई है.

हालांकि इतना सब होने के बावजूद सब कुछ निगेटिव नहीं है. गहराई से किया एक विश्लेषण बताता है कि जहां नोवेल कोरोना वायरस इंसान के फेफड़ों से हवा खींचने की कोशिश करता है, वहीं लॉकडाउन ने सही मायने में धरती माता को खुली साफ हवा देकर उन्हें नए प्राण बख्शे हैं.

शांति का राज

अटलांटिक के लिए लिखे लेख में मारिना कोरेन ने धरती, आकाश समुद्र और ध्वनि में इस अभूतपूर्व विराम से आए बदलावों की पहचान की है. उनके मुताबिक सीज्मोमीटर (भूकंपमापी यंत्र) ने मानव गतिविधियों की वजह से होने वाले कंपनों में तेज गिरावट दर्ज की है. नतीजा ये है कि अब धरती के दूसरे कोने में आने वाले 5.5 जैसी छोटी तीव्रता वाले भूकंप के कंपनों को भी सीज्मोमीटर पकड़ लेते हैं.

भारत में भी लॉकडाउन से सब कुछ थमा हुआ है. राज्यों, शहरों और जिलों में इंसानी हलचल रुकी हुई है. हमने वन्यजीवन से जुड़ी ऐसी तस्वीरें देखी हैं जिसमें खाली शहरी जमीन पर वन्यजीव घूमते नजर आ रहे हैं. पंजाब और अन्य उत्तरी राज्यों से हिमालय पर्वत श्रृंखलाएं साफ दिखाई दे रही हैं.

बेहद प्रदूषित माहौल में रहने वाले प्रकृति प्रेमियों के लिए तो ये सब सपने जैसा है. ट्रैफिक का शोर थम जाने पर अब पक्षियों की चहचहाट को जितना साफ सुना जा सकता है, पहले नहीं सुना जाता था.

अन्य प्राणियों के लिए राहत

लॉकडाउन ने धरती और समुद्र में मानव और अन्य प्राणियों के एक दूसरे के जीवन में दखल को भी बहुत कम कर दिया है. समुद्र में जहाजों और क्रूज का चलना बहुत कम हो जाने से समुद्री प्राणियों को सबसे ज्यादा राहत है. ऐसे सबूत सामने आते रहे हैं कि समुद्री ट्रैफिक, तेल के खनन और अन्य गतिविधियों से समुद्री प्राणियों को कितनी शारीरिक क्षति पहुंचती है. अब ये सब रुक चुका है तो हम्पबैक व्हेल को समुद्र में खुला विचरण करते देखा जा सकता है. क्या दुनिया के जागने के लिए इससे बड़ा कुछ और हो सकता है, मुझे आश्चर्य है.

ताजा हवा के झोंके

पिछले साल दिसंबर में स्वास्थ्य और प्रदूषण पर ग्लोबल एलायंस की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में प्रदूषण से जुड़ी मौतें सबसे ज्यादा होती हैं. औसतन हर साल इस वजह से 23 लाख लोगों की मौत होती है. भारत के सारे प्रदूषण फैक्टर में सबसे ज्यादा हिस्सा कारखानों और वाहनों की ओर से छोड़े गए जहरीले धुएं का होता है.

लेकिन जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, हवा बहुत साफ हो गई है और प्रदूषण का स्तर बहुत नीचे आ गया है. भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने लॉकडाउन से पूरे देश में हवा की क्वालिटी पर हुए असर को नापा है. हवा के प्रदूषण में सबसे बड़ा हिस्सा PM2.5 पार्टिकल्स का होता है, जो किसी भी तरह के दहन से उत्पन्न होते हैं. जैसे कि कारखानों से निकलने वाला ओजोन उत्सर्जन और वाहनों से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड.

विश्लेषण बताता है कि अप्रैल महीने में हवा में घुलने वाला जहर पिछले वर्षों के अप्रैल महीने की तुलना में बहुत कम रहा. शहरों का डेटा 20 अप्रैल 2020 तक विभिन्न जगहों से रिकॉर्ड की गई रीडिंग्स के औसत पर आधारित है. इन आंकड़ों की तुलना बीते वर्षों में अप्रैल की इतनी अवधि से ही की गई.

अगर PM2.5 रीडिंग्स की बात की जाए तो तिरुवनंतपुरम, अहमदाबाद और चेन्नई में सबसे ज्यादा सुधार हुआ है. हवा में जहरीली गैस छोड़े जाने को लेकर दिल्ली, हैदराबाद और अहमदाबाद में स्थिति सबसे ज्यादा बेहतर हुई है.

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