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हैदराबाद और विकास दुबे एनकाउंटर में बड़ा अंतर; जमानत के सारे आदेश और रिपोर्ट तलब कीं: सुप्रीम कोर्ट

हैदराबाद और विकास दुबे एनकाउंटर में बड़ा अंतर; जमानत के सारे आदेश और रिपोर्ट तलब कीं: सुप्रीम कोर्ट
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नई दिल्ली/लखनऊ। कानपुर के बिकरु गांव में 8 पुलिसकर्मियों की हत्या के आरोपी विकास दुबे के एनकाउंटर मामले की सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी की तरफ से हरीश साल्वे और प्रदेश सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों को सुनकर कहा कि हमें न बताइए कि विकास दुबे क्या था।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि हैदराबाद एनकाउंटर और विकास दुबे के मामले में बड़ा अंतर है। वे एक महिला के बलात्कारी और हत्यारे थे और दुबे और उसके सहयोगी पुलिसकर्मियों के हत्यारे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का शासन कायम करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। गिरफ्तारी, ट्रायल और फिर अदालत से सजा, यही न्यायिक प्रकिया है।

अब जांच आयोग में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज और रिटायर पुलिस अधिकारी

सुप्रीम कोर्ट ने केस की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज और रिटायर्ड पुलिस अधिकारी को शामिल किए जाने का निर्देश दिया है। जिस पर राज्य सरकार ने अपनी सहमति जताई है। सरकार ने कहा कि, एनकाउंटर मामले की जांच के लिए बनाई गई कमेटी दोबारा बनाई जाएगी। बुधवार को राज्य सरकार ड्राफ्ट नोटिफिकेशन कोर्ट को सौंपेगी। इसके बाद कोर्ट उसे देखकर पास करेगा।

कानून का शासन हो तो पुलिस कभी हतोत्साहित नहीं होगी

सुनवाई के दौरान हरीश साल्वे ने कहा कि जांच हुई तो पुलिस का मनोबल टूटेगा। इस पर चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा कि कानून का शासन हो तो पुलिस कभी हतोत्साहित होगी ही नहीं। उन्होंने विकास दुबे के क्राइम रिकॉर्ड को देखकर हैरानी भी जताई। इतने मामलों वाला व्यक्ति जमानत पर रिहा हो गया और उसने आखिरकार ऐसा क्या किया था? कोर्ट ने कहा है कि हमें सभी आदेशों की एक सटीक रिपोर्ट दी जाए। यह सिस्टम की नाकामी दिखाता है।

सीएम, डिप्टी सीएम और पुलिस के बयान की भी होगी जांच

कोर्ट ने ये भी कहा कि ये पहलू भी देखा जाए कि सीएम, डिप्टी सीएम जैसे लोगों ने क्या बयान दिए? क्या उनके कहे मुताबिक, वैसा ही पुलिस ने भी किया? दरअसल याचिकार्ताओ ने एनकाउंटर को लेकर दिए बयानों का हवाला दिया है और इसके आधार पर उत्तर प्रदेश सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करते हुए स्वतंत्र जांच की मांग की है।

पुलिस और याचिकाकर्ता ने दाखिल किया था हलफनामा

पुलिस ने विकास दुबे के एनकाउंटर को सही बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया था। जिसमें कहा था कि, विकास दुबे के एनकाउंटर की तुलना हैदराबाद के रेप आरोपियों के एनकाउंटर से नहीं की जा सकती। तेलंगाना सरकार ने एनकाउंटर की जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन नहीं किया था, जबकि यूपी सरकार ने जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाया है।

इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि न्यायिक आयोग का गठन अवैध है। सरकार ने इसके लिए विधानसभा की मंजूरी नहीं ली न ही अध्यादेश पारित किया है। जस्टिस शशिकांत अग्रवाल हाईकोर्ट के रिटायर जज नहीं हैं। उन्होंने विवादास्पद हालात में अपने पद से इस्तीफा दिया था। पुलिस ने 16 साल के प्रभात मिश्रा का भी एनकाउंटर कर दिया। पुलिस ने बदला लेने के लिए गैंगवार जैसा रवैया अपनाया। एनकाउंटर की जांच के लिए जस्टिस शशिकांत की अगुआई में ही एक सदस्यीय आयोग बनाया गया है।

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