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नागरिकता संशोधन अधिनियम पर भ्रम से बचें लोग

भ्रमजाल फैलाकर अल्पसंख्यक समुदाय में भय का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है

नागरिकता संशोधन अधिनियम पर भ्रम से बचें लोग
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देशभर में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के संबंध में चर्चा चल रही है। गलतफहमी के शिकार लोग आंदोलन पर उतर आये हैं। कुछ राजनीतिक दल और मोदी विरोधी इसी को अवसर मानकर आंदोलन को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए वास्तविकता साफ करना जरूरी है।

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) 2019 और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) दो अलग विषय हैं। आज जो भ्रम पैदा किया जा रहा है वह मुख्यत: इन दोनों विषयों को मिलाकर एक भय का माहौल अल्पसंख्यक समुदाय में पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उसी का नतीजा है कि लोग आंदोलन पर उतर आए हैं। लोगों में झूठा डर पैदा किया गया है कि इन सारे कदमों से मुसलमानों का संरक्षण समाप्त हो जाएगा और उन्हें बाहरी घोषित किया जाएगा। यह तथ्य सरासर गलत है।

आइये, पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम को समझें। बांग्लादेश और पाकिस्तान विभाजन के समय भारत का हिस्सा थे। अफगानिस्तान पहले से विशाल भारत का हिस्सा रहा है। पाकिस्तान का निर्माण मजहब के आधार पर किया गया था। मजहब के आधार पर मुसलमान लोग भारत से पाकिस्तान चले गए और वहां से हिन्दू बड़ी संख्या में उसी समय भारत वापस आए। उस समय महात्मा गांधी ने कहा था कि 'एक ही भारत के अब दो टुकड़े हुए हैं। भारत में आए हुए लोगों को नागरिकता देना हमारा कर्तव्य है।' यही बात नेहरू जी और सरदार पटेल जी ने भी कही थी और उस समय जो लोग भारत आये वैसे लाखों शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दी गई थी। बांग्लादेश पाकिस्तान का ही हिस्सा रहा है। आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश तीनों घोषित इस्लामिक देश हैं। इसलिए वहां मुसलमानों के धार्मिक प्रताडऩा का सवाल नहीं उठता। भारत में देश का मजहब कोई पंथ नहीं है। यहां संविधान सर्वोपरि है। इसलिए हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी शरणार्थियों को नागरिकता देने का समर्थन और नीति भारत ने सदा अपनाई।

सन् 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पहली दफा इसे कानूनी जामा पहनाया और साफ किया कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से जो हिन्दू शरणार्थी आएंगे उनको नागरिता देंगे। आश्चर्य की बात है कि आज आंदोलन करने वाले कई दल उस समय अटल जी सरकार का समर्थन करते थे। उसके बाद 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में मनमोहन सिंह की सरकार बनी। उन्होंने संसद में इसी बिल को फिर से पारित करके उसकी समयावधि 1 साल के लिए बढ़ाई। फिर 2005 में उन्होंने फिर से इस कानून की वैधता 1 साल और बढ़ाई। उस समय उनके साथी कम्युनिस्ट, तृणमूल कांग्रेस और कई अन्य दल थे जो आज इसके विरोध में बोल रहे हैं। 2003 का कानून केवल पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले केवल हिन्दुओं की बात करता है। आज का कानून हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी सबकी बात करता है जिनका धार्मिक प्रताडऩा होते आ रहा है।

मोदी सरकार ने जो नागरिकता संशोधन अधिनियम बनाया है उसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और पारसी प्रताडऩा के शिकार होते हैं, उनके लिए है। ऐसे पंथों के शरणार्थियों को नागरिकता देने की व्यवस्था इस कानून में है। यह पहले से ज्यादा व्यापक है। सही में, सभी पार्टियों को इसका स्वागत करना चाहिए था। लेकिन राजनीति के कारण 2004 और 2005 में ली भूमिका के विरोध में आज कुछ दल खड़े दिखाई देते हैं। यह पाखंड है।

कुछ लोग पूछते हैं कि सरकार मुसलमानों के साथ भेदभाव क्यों कर रही है? इसका उत्तर है कि मुसलमानों के साथ कोई भेदभाव न हो रहा है और न होगा। देश के जो नागरिक हैं उनमें से एक को भी तकलीफ या असुविधा न होगी और न उसकी देशभक्ति पर या उसके अधिकारों पर आंच आएगी। यह प्रश्न भारत के नागरिकों का नहीं है। ये तीन देशों से आये हुए शरणार्थियों का है। चूंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इस्लामिक देश हैं। वहां मुस्लिम समाज को धार्मिक प्रताडऩा का शिकार नहीं बनना पड़ता है। इसलिए प्रधानमंत्री जी के एक सवाल का जवाब भी विपक्षी दलों ने नहीं दिया है। क्या इन तीन देशों के मुसलमानों को खुली छूट देनी चाहिए भारत आने की? क्या 30 करोड़ आबादी को भारत की नागरिकता देने के लिए विपक्ष तैयार है? और क्या यह उचित है?

दुनिया में कोई भी देश नागरिकता आसानी से नहीं देता। हर देश के अपने कानून हैं और हर देश में अवैध घुसपैठियों को पहचान कर वापस भेजा जाता है। यह दुनिया का रिवाज है। उस पर तो कोई आपत्ति नहीं करता। भारत ने भी अगर वही नीति अपनाई तो उस पर आपत्ति करना दुर्भाग्यपूर्ण है। राजनीति के लिए विपक्ष ने जान-बूझकर नागरिकता संशोधन अधिनियम एवं एनआरसी को मिक्स करके भ्रम की स्थिति पैदा की।

दुनिया के सभी प्रमुख देशों में नागरिकों की सूची होती है। भारत में नहीं थी। इसीलिए ऐसी सूची बनाने की कवायद एनआरसी में की गई है। एनआरसी की शुरुआत राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौते के समय स्वीकार की। उसके तहत ही असम में नागरिकता सूची बनी है। उसमें जिन लोगों के नाम नहीं हैं उनको अभी अपील का मौका दिया गया है। यह काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रहा है तो इस प्रक्रिया पर शंका प्रकट करना गलत है।

हालांकि अभी तो एनआरसी की रूपरेखा सामने भी नहीं आई है। तब ही विवाद पैदा करना दुर्भाग्यपूर्ण और राजनीति से प्रेरित है। जब आधार कार्ड की शुरूआत हुई तो कई लोग कहते थे कि गरीब कहां से कागज लाएगा? कहां से पहचान बता सकेगा? कहां से सारी प्रक्रिया पूरी कर सकेगा? लेकिन आज 10 साल बाद हम क्या देख रहे हैं। भारत के लगभग सभी नागरिकों ने आधार कार्ड प्राप्त किया है। आशंका उठाने वालों से सामान्य जनता ज्यादा होशियारी से काम करती है। यही इसका अर्थ है।

अभी तो केवल नागरिकता संशोधन अधिनियम आया है। एनआरसी की केवल चर्चा है। लेकिन मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि भारत के किसी भी नागरिक को एनआरसी से बाहर नहीं रखा जाएगा। किसी को भी डरने की या भ्रमित होने की जरूरत नहीं है। आज जिस तरह से जान-बूझकर कुछ तत्व हिंसा फैला रहे हैं, उसका तथ्य भी जल्दी सामने आएगा। मोदी जी की ऐतिहासिक दूसरी बार जीत, ट्रिपल तलाक बिल, अयोध्या मसले का शांतिपूर्ण समाधान, अनुच्छेद-370 का रद्द होना। इसमें विपक्ष कुछ कर नहीं पाया। वह गुस्सा उसके मन में ठूंस-ठूंसकर भरा है। अब एक भ्रम पैदा करने का अवसर मिला तो उसी का फायदा विपक्षी दल उठाना चाहते हैं। लेकिन देश में ऐसी नकारा सोच की राजनीति कभी सफल नहीं होगी।

-- लेखक केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री हैं

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