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भलमनसाहत या परोपकार को द्वेष में बदलने की कला

अराजकता बिग्रेड ने अपनी गतिविधियां एक बार फिर शुरु कर दी है

भलमनसाहत या परोपकार को द्वेष में बदलने की कला
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एक अत्यंत गोपनीय संदेश 1950 की शुरुआत में दिल्ली से इस्लामाबाद प्रसारित किया गया था। संदेश गंभीर एवं विषादयुक्त था, फिर भी आवाज में बेहद पीड़ा थी। संदेश यह था : 'मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह अत्यंत आवश्यक है कि दोनों ही सरकारों को (भारत और पाकिस्तान) बंगाल की स्थिति (हिंदुओं पर हिंसक हमले) के संबंध में कोई ठोस घोषणा करनी चाहिए कि हमारी भविष्य की नीति चाहे जो भी हो, वर्तमान नीति को निश्चित तौर पर स्पष्ट किया जाना चाहिए। मेरे सुझाव यह थे कि दोनों ही सरकारों को सार्वजनिक रुप से घोषणा करनी चाहिए कि अल्पसंख्यकों में जो भी पीडि़त हैं उनकी क्षतिपूर्ति वे कर देंगे और जिन्हें बेघर कर दिया गया है या जो हाल ही में पलायन कर गए हैं उनके पूर्ववर्ती स्थानों पर ही पूरी तरह से उनका पुनर्वास करने की जिम्मेदारी ली जाएगी।

संदेश भेजने वाले को दूसरे पक्ष की ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा पर संदेह था। इसलिए, उन्होंने यहां तक कि कठोर दंड देने का भी जिक्र यह कहते हुए किया,'वे (सरकारें) दोषियों को दंडित करने और लूटी गई संपत्ति की वसूली एवं वापसी के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे। यह चेतावनी जारी की जानी चाहिए कि जिन लोगों के पास इस तरह की लूटी गई संपत्ति है, वे कुछ दिनों के भीतर इसे वापस कर दें अन्यथा वे सजा भुगतने के लिए तैयार रहें। यह संदेश पंडित जवाहरलाल नेहरु द्वारा पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को भेजा गया था। जहां एक ओर पंडित नेहरु और उनके उत्तराधिकारियों से लेकर हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी तक ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और उनकी समृद्धि सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता का सम्मान किया है, वहीं पाकिस्तान ने निश्चित रुप से अपना यह वादा तोड़ा है। पाकिस्तान में रहने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्ध, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को पाकिस्तान के कट्टरपंथी तत्वों के हाथों भारी हिंसा, जबरन धर्म परिवर्तन, दुष्कर्म और लूट का सामना करना पड़ा है। एक ईसाई महिला आसिया बीबी से जुड़े कुख्यात ईश-निंदा मामले से सभी अवगत हैं।

पाकिस्तान में बहुसंख्यक समुदाय द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तनों से ही पानी पीने के कारण पाकिस्तान में हिंसक भीड़ द्वारा आसिया बीबी को बुरी तरह पीटा गया था। पाकिस्तान की सरकार ने या तो सोच-समझकर या कुटिल चूक करते हुए इन समुदायों की अपने अधिकारों की रक्षा करने की दलीलों की उपेक्षा की है। इन्हीं समुदायों ने बांग्लादेश और अफगानिस्तान में भी हत्या, दुष्कर्म और लूट का सामना किया है। यहां पर यह नहीं कहा जा रहा है कि बांग्लादेश और अफगानिस्तान की सरकारें इस मामले में चुप रही हैं। लेकिन, कट्टरपंथी तत्व इन देशों के सामाजिक मामलों में काफी हद तक दखल देते रहते हैं जिससे अल्पसंख्यकों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करना अत्यंत मुश्किल है। अफगानिस्तान में तालिबान की ओर से निरंतर भयावह खतरा विश्व स्तर पर गंभीर चिंता का विषय है। अफगानिस्तान के कई हिस्सों में तालिबानी सक्रिय हैं और वे अक्सर यहां तक कि सरकार नियंत्रित शांतिपूर्ण एवं इलाकों में भी हिंसा करने से बाज नहीं आते हैं। तालिबान द्वारा बामियान बुद्ध पर बमबारी की कुख्यात घटना तालिबान के दौर को दर्शाती है। अफगानिस्तान में सिखों, बौद्धों, पारसियों और हिंदुओं के समुदाय की आबादी एक समय 50,000 से भी अधिक थी जो आज घटकर 1000 से भी कम रह गई है। आजादी के बाद से इन समुदायों के हजारों लोग भारत में रह रहे हैं। भारत ही एकमात्र ऐसी जगह है, जिसे वे अब घर कहते हैं। वे और कहां जा सकते थे और फिर भी, यह देश और उसकी सरकारें, उन्हें नागरिकता नहीं देकर अब तक इन शरणार्थियों के साथ अन्याय कर रही थी। वो भी तब जब गांधी सल्तनत इन लोगों को नागरिकों के रुप में स्वीकार करने का वादा कर चुकी थी।

कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं ने नागरिकता प्रदान करने का अनुरोध किया था जैसे अशोक गहलोत और तरुण गोगोई। यहां तक कि ममता बनर्जी चाहती थीं कि इन लोगों को भारत के नागरिक के रुप में स्वीकार कर लिया जाए। ये वो सभी लोग थे जो पचास के दशक के बाद से भारत में थे, हमारी अर्थव्यवस्था में शामिल थे और हमारे कानूनों का पालन करने के लिए बाध्य थे। फिर भी, हमने एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रुप में उन्हें विफल कर दिया। आज, जब नरेन्द्र मोदी सरकार इन लोगों को नागरिकता प्रदान कर रही है 'अराजकता बिग्रेडÓ ने अपनी गतिविधियां एक बार फिर शुरु कर दी हैं। इस ब्रिगेड ने बिना किसी सबूत के कई वर्षों तक बीजेपी पर यहां-वहां मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया और मानव अधिकारों की आड़ में, उन्होंने सरकारी तंत्र में बड़े करीने से हेर-फेर किया। इस ब्रिगेड ने कभी भी महात्मा गांधी के नाम का इस्तेमाल करने से परहेज नहीं किया और अब तक, यदि अल्पसंख्यक किसी वजह से आना चाहते हैं तो उनको पाकिस्तान से भारत आने की अनुमति देने के लिए उसने महात्मा गांधी की शिक्षाओं को स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि वे अपने वोट बैंक से डरते हैं। लेकिन, हमारे अंदर भारत के संविधान और बापू के शब्दों का अनुसरण करने की कर्तव्य भावना है। इतिहास के पन्नों में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को सुनहरे शब्दों में लिखा जाएगा।

यह कार्य एक परिपक्व और जिम्मेदार लोकतंत्र के रूप में दक्षिण एशिया और दुनिया में भारत की स्थिति को मजबूत करता है। हालांकि, इस अवधि में यह भी दर्ज किया जाएगा कि किस प्रकार अराजकता ब्रिगेड ने झूठी खबरें (फेक न्यूज) तैयार की और देश को आग में झोंकने की कोशिश की। सबसे पहले उन्होंने सीएए के बारे में झूठ फैलाने की कोशिश की कि यह भारतीय मुसलमानों की नागरिकता ले लेगा। कांग्रेस पार्टी की तरफ से इस तरह का खुल्लम-खुल्ला सफेद झूठ महात्मा गांधी और पंडित नेहरु का अपमान है। हालांकि, जब इस देश के स्मार्ट नागरिकों ने इसकी उपेक्षा की, उन्होंने तुरंत इसे एनआरसी से जोड़कर नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। अखिल भारतीय एनआरसी पर सरकार की एक भी बैठक नहीं हुई है। यहां तक कि असम में जिस एनआरसी के बारे में बात की जा रही है उसका फैसला राजीव गांधी सरकार ने किया था और उसे उच्चतम न्यायालय की देखरेख में लागू किया गया था।

महात्मा गांधी की 150वीं जयंती और गुरु नानक देव की 550वीं जयंती के दौरान इस तरह की आगजनी और हिंसा कांग्रेस और उसके सहयोगियों की हालत को प्रतिबिंबित करती है। जहां भारत अपनी अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर बनाने की तैयारी कर रहा है, अराजकता ब्रिगेड पर पहियों को जाम करने का भूत चढ़ा हुआ है और वह हमें अराजकता में डुबाने पर आमादा हो गई थी। लेकिन, आम भारतीय नागरिक बहुत बुद्धिमान है। विशेष रुप से प्रधानमंत्री के रामलीला मैदान के भाषण के बाद, भारत आश्वस्त है और आसमान छूने की तैयारी कर रहा है। फेक न्यूज, हिंसक विरोध और आगजनी प्रधानमंत्री और उनकी टीम को भारत को अधिक ऊंचाइयों तक ले जाने से नहीं रोक सकती है। इस तरह की घटनाएं केवल नये भारत के निर्माण के लिए कड़ी मेहनत करने के हमारे संकल्प को और मजबूत करती है।

-- लेखक केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री हैं


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