Top
undefined

संघ पर आरोप के पीछे अंग्रेजी मानसिकता और ईष्र्या

संघ पर आरोप के पीछे अंग्रेजी मानसिकता और ईष्र्या
X

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने उद्भव के पहले दिन से राष्ट्रसेवा में संलग्न है। वह राष्ट्र संस्कृति के लिए समर्पित है। समाजसेवा उसके प्रत्येक स्वयं सेवक की प्राथमिकता में है। स्वतंत्रता के बाद संघ का राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पण सबने देखा है। स्वतंत्रता संघर्ष में संघ के प्रभाव वाले क्षेत्रों में आंदोलन जितना तीव्र अनुशासित और संगठित होता था उतना अन्य क्षेत्रों में नहीं। सीधे राजनीति करना संघ का उद्देश्य नहीं, और न श्रेय लेना उसके संस्कार में है फिर भी संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। स्वतंत्रता संघर्ष में तब कोई ऐसे प्रमुख नेतृत्वकर्ता नहीं जिन्होंने संघ कार्यों की प्रशंसा न की हो, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, पं. जवाहरलाल नेहरु, सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि एक लंबी सूची है फिर भी गांधीजी की हत्या में राष्ट्रीय स्वयं सेवक को घसीटा गया, प्रतिबंध लगा, गिरफ्तारियां हुई और दमन करने का ऐसा कोई उपाय न बचा जिसका प्रयोग संघ से जुड़े लोगों पर न हुआ हो। प्रश्न यह उठता है कि यदि संघ ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था और तत्कालीन नेतृत्व के सभी शीर्षस्थ नायक संघ के प्रशंसक रहे तो फिर गांधीजी की हत्या के नाम पर इतना दमन करने का कारण क्या था? और कौन सी ऐसी शक्ति थी जो यह सब कर रही थी।

यद्यपि संघ वाले पीछे पलटकर नहीं देखते। वे लक्ष्य निर्धारित करके आगे की राह बनाते हैं। वे न तो किसी विषय का स्पष्टीकरण देते हैं और न उन्हें किसी से प्रशंसा की आकांक्षा होती है। वे एक गति से अपनी राह पर चलते हैं। फिर भी यह जिज्ञासा स्वाभाविक होती है कि पूर्णतया राष्ट्रभाव के प्रति समर्पित संगठन पर इतना बड़ा आक्षेप क्यों? इस प्रश्न का समाधान उस समय की राजनैतिक, सामाजिक, प्रशासनिक और राष्ट्रीय परिस्थितियों पर एक दृष्टि डालने से स्पष्ट हो जाता है। भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता अवश्य मिल गई थी पर उस पर शासनकाल की पूरी प्रणाली और प्रशासन अंग्रेजों का था। अंग्रेजों के अंतिम वायसराय माउंट बेंटन ही भारत के पहले गर्वनर जनरल रहे। इसके कारण अंग्रेजों की पुलिस, उन्हीं की सेना, उन्हीं की सूचना तंत्र, उन्हीं की जांच एजेंसी ज्यों की त्यों रही। हालांकि माउंटवेटन 21 जून 1948 में चले गए थे लेकिन व्यवस्था में जनवरी 1949 तक कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। इसके कारण दो थे। एक तो उस समय भारत विभाजन का तनाव, हिंसा, शरणार्थियों की भीड़, पाकिस्तान का कश्मीर पर हमला आदि तमाम परिस्थितियों उत्पन्न हो गई थी जिनसे भारतीय नेतृत्व जूझ रहा था। लेकिन इससे भी बड़ा कारण यह था कि भारत ऐसे ही स्वतंत्र नहीं हुुआ था कि अंग्रेज छोड़कर चले गए और भारतीयों ने सत्ता की चाबी संभाल ली। यह एक 'पावर ट्रांस्फर एग्रीमेंटÓ थी जो 18 जुलाई 1947 को ब्रिटिश संसद में पारित हुआ और भारत में लागू हुआ। माउंटबेंटन खुद एक-एक चीज देख रहे थे। यहां तक कि जो रियासतें भारत संघ में मिलना चाहती थीं उनसे बातचीत भी माउंटबेटन ही करते थे। 15 अगस्त 1947 को हमें 'स्वतंत्र भारतÓ नहीं अपितु 'ब्रिटिश इंडियाÓ नाम मिला था। माउंटबेंटन उस मानसिकता और शासन के प्रतिनिधि थे जो कभी अंग्रेजों के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को कांग्रेस से ज्यादा खतरनाक मानती थी यह टिप्पणी 1931 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद नागपुर के रेजीडेंट गर्वनर ने की थी।

नागपुर रेजीडेंट की इस टिप्पणी के पीछे दो कारण थे एक तो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राष्ट्र और संस्कृति के प्रति समर्पित था जो अंग्रेजों को पसंद नहीं था दूसरे संघ शाखाओं का विस्तार तेजी से हो रहा था। नागपुर में दस स्थानों पर संघ की शाखा लगती थी। यही कारण था कि 1931 के आंदोलन में गिरफ्तार आंदोलनकारियों में जो संघ से जुड़े थे उन्हें अन्य आंदोलनकारियों की तुलना में अधिक दिनों तक निरुद्ध किया गया। इनमें अप्पाजी जोशी संघ चालक वर्धा, बापूराव वैघ संघ चालक सिरपुर, जैसे 22 प्रमुख पदाधिकारियों के साथ 300 से ज्यादा स्वयं सेवक थे। 1935 में नागपुर रेजीडेंट ने आदेश निकाला कि शासन से जुड़े लोग संघ की शाखाओं से दूर रहे। 1928 से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयं सेवकों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। उनका संगठित प्रतिरोध अंग्र्रेजों की आंखों में सदैव खटकता था। संघ केवल आंदोलन तक सीमित नहीं था। बल्कि उसकी शाखाओं में राष्ट्रभाव और संस्कृति के मूल तत्व से जुडऩे का संकल्प होता था। अंग्रेजी सत्ता को आंदोलनों से तो घबराहट होती ही थी लेकिन इससे ज्यादा बैचेनी संघ के संस्कृति जागरण अभियान और युवाओं को उनकी जड़ों से परिचित कराने के संकल्प से होती थी। अंग्रेजी सत्ता के सबसे प्रमुख काम दो ही थे एक लोगों को उनकी जड़ों से काटना और दूसरा धर्म, जाति, भाषा के आधार पर उन्हें बांटना यही उनके शासन की मजबूती के सूत्र थे। संघ आरंभिक दिवस से आज तक इन दोनों बातों के विरुद्ध काम करता है। संघ एक संगठित समाज और संगठित राष्ट्र के लिए प्रयत्नशील संघ की शाखाओं में आज भी जाति सूचक उपनाम नहीं लिए जाते। इसलिए अंग्रेजों की नजर में संघ दुश्मन नंबर एक था।

माउंटबेंटन जब भारत आए तो वे इन सब बातों का अध्ययन करके आए थे। उन्हें 1857 से 1946 तक की प्रमुख घटनाओं की फाइलें दी गई थीं। वे लंदन में उन तमाम लोगों से मिले जो भारत में गवर्नर रहे, रेजीडेंट रहे, सैन्य अधिकारी या न्यायधीश रहे। सब समझकर वे भारत आए। अपने साथ न केवल भारत विभाजन का अपितु यहां काम करने की योजना का प्रारुप साथ आए थे। उन्होंने 3 जून 1947 को विधिवत कार्यभार संभाला और 4 जून को अंग्र्रेजी शासन के 'खैर ख्वाहोंÓ की बैठक ली। उसके बाद बाकी लोगों से बात की।

30 जनवरी 1948 को जब गांधीजी की हत्या हुई तब माउंटवेंटन ही भारत के गर्वनर जनरल थे। प्रशासन उन्हीं के संकेत पर चलता था। भारतीय नेतृत्व बैठकों, लोगों को समझाने में लगा था। गांधीजी की हत्या में संघ और हिंदू महासभा को फंसाने का कुचक्र 31 जनवरी 1948 से आरंभ हुआ।

उस समय तक यह बात सब जानते थे कि नाथुराम गोड़से और उसकी टीम वर्षों पहले संघ से नाता तोड़ चुकी थी। नाथुराम गोड़से 'राष्ट्रवादÓ के कारण संघ से जुड़ा। स्वयंसेवक भी रहा लेकिन उसके विचार उत्तेजना के अतिरेक तक थे जो संघ की शैली नहीं है। संघ 'राष्ट्रवादÓ के बजाय 'राष्ट्रभावÓ पर जोर देता है। वह विभाजन और नफरत के किसी विषय को पसंद नहीं करता। इसलिए गोड़से ने संघ से किनारा कर लिया। वह 1933 में संघ से अलग हुआ और हिंदू महासभा से जुड़ा। लेकिन वहां भी उसका नाता लंबे समय तक न रहा। अंत में 1942 में उसने 'हिंदू राष्ट्र दलÓ बनाकर नौजवानों को जोडऩा शुरु किया। गांधीजी की हत्या के बाद 31 जनवरी 1948 को मंत्रीमंडल की बैठक हुई। इसमें 'किसी, ने इस हत्याकांड में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा का हाथ होने की जानकारी दी। मंत्रीमंडल की बैठक के जो 'मिनिट्सÓ अभी उपलब्ध है उनमें हम किसी का कोई विवरण नही। उसमें वह नाम नहीं लिखा जिसने यह जानकारी दी। हा सकता है यह किसी ऐसे अफसर ने दी हो जो राष्ट्रभाव से खुंरक रखता हो। इस आधार पर नेहरुजी ने सरदार पटेल को जांच के आदेश दिए। तीन दिन बाद पुलिस ने किसी नौजवान का एक लिखित बयान पटेल जी को सौंपा जिसमें लिखा था कि 'संघ की शाखाओं में 30 जनवरी को अच्छी खबर आने की बात कही गई थी।Ó इस आधार पर चार फरवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर प्रतिबंध लगा और तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी सहित अनेक संघ के अधिकारियों की गिरफ्तारियां हुई। इसी बीच 26 फरवरी 1948 को इस हत्याकांड प्रारंभिक जांच रिपार्ट आई जिसमें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिंदु महासभा का कोई कनेक्शन नहीं पाया गया फिर भी न तो संघ से प्रतिबंध हटा और न बंदी बनाए गए लोगों की रिहाई हुई। इसके अगले दिन 27 फरवरी 1948 को सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरुजी को पत्र लिखा कि 'गांधीजी की हत्या में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और हिंदू महासभा का कोई कनेक्शन नहीं पाया गया।Ó नेहरुजी की ओर से यह पत्र गर्वनर जनरल माउंटबेंटन की ओर भजा गया। लेकिन उनके कार्यालय से कोई उत्तर न आया। हमें यह अनुमान लगाने में कोई कठिनाई नहीं है कि माउंटवेंटन के कार्यालय में जानबूझकर इस पत्र को दबाया गया। बहुत संभव है कि तत्कालीन सरसंघ चालक गुरुजी इस बात को जानते होंगे इसीलिए उन्होंने जुलाई 1948 तक संघ पर हुए सारे दमन कार्यों को चुपचाप सहा। माउंटबेंटन का कार्यकाल 28 जून 1948 तक रहा। उनकी बिदाई के बाद गुरुजी ने जुलाई 1948 को सरकार वल्लभ भाई पटेल को पत्र लिखा कि 'या तो उनके और संघ के ऊपर लगे आक्षेप प्रमाणित किए जाएं अन्यथा प्रतिबंध हटाकर सबको रिहा किया जाए।Ó इसका उत्तर सरदार पटेल ने 11 सितंबर 1948 को गुरुजी को लिखा। सरदार पटेल ने संघ पर सीधा आक्षेप तो नहीं लगाया लेकिन लिखा कि 'मैं मानता हूं कि संघ ने समाजसेवा की है पर आजकल उनके द्वारा उत्तेजक भाषण दिए जा रहे हैं। जिसके कारण गांधीजी का बलिदान हुआ।Ó इसके उत्तर में गुरुजी ने पुन: सरदार पटेल को पत्र लिखा। जिसमें लगाए गए सभी आरोपों को असत्य बताया और कहा कि वे प्रमाण जुटाएं। यदि एक भी प्रमाण मिले तो संघ को 'विसर्जित कर देंगे।Ó

इसी बीच गांधीजी की हत्या के लिए अदालत में चालान प्रस्तुत हो चुका था। जिसमें कुल नौ आरोपी थे। उस विस्तृत जांच में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का न तो नाम सामने आया और न कोई कनेक्शन। इससे स्पष्ट हुआ कि संघ को केवल फंसाया गया है। फिर भी सरकार की तरफ से संघ पर प्रतिबंध हटाने की कोई हलचल शुरु नहीं हुई। इसके कारण संघ से प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर 9 दिसंबर 1948 को देशभर में प्रदर्शन हुआ जिसमें लगभग 77 हजार गिरफ्तारियां हुई। इसी बीच 10 फरवरी 1949 को गांधीजी की हत्या पर फैसला आया। जिसमें दो लोगों नाथुराम गोंडसे और नारायण आप्टे को फांसी तथा शेष 6 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इस 110 पेंजों के फैसले में भी गांधीजी की हत्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई उल्लेख नहीं।

इस फैसले के बाद संघ से प्रतिबंध हटाने की मांग बढऩे लगी। सरकार पर दबाव भी बढ़ा। सरकार के पास कोई विकल्प भी न था। अतएंव 11 जुलाई 1949 को संघ से प्रतिबंध हटा और सभी बंदियों की बिना शर्त रिहाई हुई। संघ पर प्रतिबंध हटने के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने गुरुजी को पत्र लिखा 'संघ पर प्रतिबंध हटने से मुझे खुशी हुई है, इसका प्रमाण मेरे निकट के लोग भी बता सकते हैं शुभकामनाएं। इसके बाद 16 अगस्त 1949 को सरदार वल्लभ भाई पटेल गुरुजी से मिलने भी गए।

प्रतिबंध हटने के दो वर्षों तक संघ पर कभी किसी ने कोई आरोप नहीं लगाया। संघ पर गांधीजी की हत्या के संबंधी आक्षेप 1951 में तब शुरु हुई जब संघ ने राजनैतिक दल गठित करने का निर्णय लिया। इन तमाम आरोपों के चलते इंदिराजी 1965 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश जीवनलाल कपूर की अध्यक्षता में एक न्यायिक जांच आयोग गठित किया। इस आयोग ने चार वर्षों में 101 लोगों के बयान लिए, 162 बैठकें की और 1969 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और गांधीजी की हत्या से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को बेदाग बताया। इन तमाम घटनाक्रमों से यह बात स्पष्ट होती है कि गांधीजी की हत्या के समय संघ को फंसाने का काम अंग्रेजी मानसिकता के संघ विरोधी लोगों ने किया और बाद में संघ के बढ़ते प्रभाव और संघ का पहले राजनैतिक दल भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी से संबंधों के चलते ही किया जाता है। आज घटनाएं घट चुकी हैं, अतीत का संपूर्ण विवरण हमारे सामने है। जिसके एक एक बिन्दु को समझा जा सकता है और यह समझने में कोई कठिनाई नहीं है कि संघ पर गांधीजी की हत्या से संबंधित आक्षेप असत्य हैं, आधारहीन हैं और इसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं यह एक अंग्रेजी मानसिकता और दूसरा संघ के बढ़ते प्रभाव से ईष्र्या।

Next Story
Share it